Wednesday, October 26, 2016

दिवाली आने के कुछ दिन पहले से मन मानो 15-20 साल पहले पहुंच जाता है। सामने तैरने लगतीं हैं, जयपुर, अजमेर, उदयपुर और भोपाल शहरों की कुछ तस्वीरें। इन शहरों में बिताए बचपन के वो दिन किसी तिलिस्म से कम नहीं होते थे, घर का कोना-कोना साफ करना, रसोई का हर एक डिब्बा खुलना, पता नहीं किसमें से ढकी-छिपी कोई खाने की चीज निकल आए, अलमारियों में तह कर रखीं पुरानी चादरों, कपडों को धूप दिखाके जैसे दोबारा जिंदगी दे देना, कभी-कभी हालांकि सिरदर्दी भी लगती कि मम्मी पता नहीं, इतने अटाले को कब तक संभाल कर रखेंगी...
फिर शुरू होता मम्मी के पकवानों और हमारे नखरों का सिलसिला, जरा शक्कर कम डालना मम्मी, ज्यादा तला-तला मत बनाना, छठे-चौमासे बनने वाले इन पकवानों को खिलाने के लिए मम्मी को जितनी हमारी मनुहार करनी पड़ती थी, उतनी तो शायद उनको बनाने में उनकी मेहनत भी नहीं लगती होगी। दिवाली के दिन तो जैसे पूरे घर को मम्मी के साथ गेरू-खड़िया के मांडनों में रंगने की कोई दौड़ होती। गीले मांडनों पर पैर भूले से भी नहीं धरने की जितनी हिदायतें, उतना ही आता छोटे भाई को उनका बिगाड़ने में आनंद। इन सबके बीच साल भर के इस त्योहार पर हम ना जाने कितनी उम्मीदें, कितनी अपेक्षाएं मम्मी-पापा की झोलियों में डाल देते, कभी अहसास ही नहीं हुआ...
दिन कब सालों में बदल गए, पता ही नहीं चला, अब तो है बस शून्य से उठता सा एक आवेग, 16-17 की उम्र में जो अटाला लगता था, उसे तो अब मानो टटोलने को भी तरस गया है जीवन। कितने भी पकवान बना लूं, उनमें 'चीनी कम' ही लगती है, कई साल से गेरू को हाथ नहीं लगाया, पर वो एक अकेला गेरुआ रंग आज भी रंगोली के दर्जनों रंगों भर भारी पड़ता महसूस होता है...
गृहस्थी के असंख्य दायित्वों और तीज-त्योहारों पर एकदम बदली महसूस होतीं परंपराओं में खुद को ढालने की कोशिशों के बीच किस्से सुनती हूं अब पापा से, मम्मी के हर अभियान में अकेले जुटने के। मन मानो ये यकीन करने लगता है कि पापा अब सिर्फ पापा नहीं रहे, धीरे-धीरे लालिमा-गरिमा का रूप धर रहे हैं, मम्मी का हाथ बंटाने में। त्योहार आएगा और चला जाएगा, पर ससुराल की हो चुकी बेटियां क्या त्योहारों पर अपनी जीवनदायिनी का हाथ कभी बंटा पाएंगी, ये तो शायद इस देश का कानून भी कभी ना निर्धारित कर पाए...
कई बार लगता है समय कभी एक सी गति से नहीं चलता, बचपन में जिन त्योहारों के लिए एक-एक दिन 365 दिनों के बराबर लगता था, वही अब कब आ जाते हैं, महसूस ही नहीं होता। फिर लगता है, त्योहार तो बचपन में होता था, अब तो सिर्फ घर-बार होता है...
#ब्याहताबेटी #दिवाली